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Saturday, October 8, 2016

विश्वास



कई दिनों से घर में चुहिया आया जाया करती थी। हम लोग भी ज्यादा ध्यान नहीं देते थे। इधर कुछ नुकसान हुआ तो चूहेदानी खरीद लाये, कुछ चुहिया फंसी तो इज्जत से उन्हें बाहर छोड़ आये। मगर फिर बात नहीं बनी तो रैट किलर लाकर घर में रखे। इसका भी कोई खास प्रभाव नहीं दिखा। अब एक दिन हाल में घेर कर मारने की कोशिश की तो भाग गयी। पडोसी को भी समझाया की भाई साफ सफाई का ध्यान रखा कर, हम भगाते है तो निकल भागती है मगर तुम्हारे कबाड़ वाले कमरे में जा छिपती है। वह कुछ सुनता नहीं तो हम लोंगो ने भी ध्यान देना बंद कर दिया । मगर अब हद होने लगी, एक दिन मेरी प्यारी शर्ट आलमारी में कटी फिर एक दिन बच्चे का स्कुल ड्रेस चुहिया ने काट डाला। अब मामला सिर से ऊपर गुजर गया।
अब बस मौके की तलाश में था।
परसो की रात करीब 10 बजे किचन में एक चुहिया दिखी। आनन फानन में किचन का दरवाजा बंद, दरवाजे के नीचे कपडे डाल पूरा बंद किया , हाथ में झाड़ू और कुछ ही पलों में चुहिया का अंत। अब चुहिया को बालकनी में रख दिया की सुबह बच्चों को दिखाऊंगा की इसने तेरी स्कुल ड्रेस काटी थी। सुबह बच्चों को बताया तो बच्चे देखने गए तो वहाँ चुहिया नहीं थी। बच्चों ने मजाक बना दिया की क्या पाप आप भी झूठ बोलने लगे, भला आप क्या मारोगे चुहिया जो मच्छर तो मार नहीं पाते।
हम क्या करते विश्वास टूटा तो ख्याल आया की फ़ोटो खीच लिया होता तो बच्चों को कम से कम सबूत के तौर पर दिखा तो देता।
मगर लगता है कोई कौआ या दूसरा पंछी उस चुहिया को सुबह ही उठा ले गया होगा।
आज छुटके ने कहा की पापा चुहिया तो कल सुबह से दिखी नहीं लगता है कि आपने सच में उसका काम तमाम कर दिया है। बच्चे का ये विश्वास पा सच में बहुत ही सकून मिला। दो दिन उदास सा लगा । मगर आज लगा आपस में हममे फिर विश्वास बढ़ गया है। लगा विश्वास के आगे सबूत अक्सर बौने साबित होते है।