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Wednesday, March 21, 2012

ताकत

           कालेज  का नया सत्र शुरू हो गया था. सीनियर छात्रों द्वारा रैगिंग काफी जोर शोर से ली जा रही थी. एक सीनियर बैच ने तीन छात्रों  को पकड़ा और उनकी रैगिंग शुरू कर दी. दो  छात्र तो उनके कहे अनुसार चालू   हो गये, मगर एक छात्र चुपचाप खड़ा था.
          
            तभी एक सीनियर छात्र ने गुर्राते  हुए कहा , " क्यों बे तेरा बाप मर गया जो शोक मना रहा, चल शुरू हो जा नहीं तो ..."

          " मेरा बाप इस जिले का एस. पी . है ......"

          सीनियर लड़कों की भीड़ छटने लगी थी. रैगिंग  बंद हो चुकी थी और  बाकी के दो जूनियर लड़कों ने भी राहत की साँस ली .



Tuesday, December 27, 2011

अपना माल

             वह अपने बचपन के दोस्त से काफी दिन बाद मिल रहा था . दोस्त लडकियाँ पटाने में माहिर था. उसने सोंचा क्यों न इस मुलाकात में अपने दोस्त से लडकियाँ पटाने का कुछ टिप्स लिया जाय. उसने अपने दोस्त से अपनी परेशानी बताई , " यार जिस कालेज में मैंने एडमिशन लिया है उसमें एक नई पटाखा  माल आयी  है. क्या लगती है यार , उसे पटाने का कुछ गुरुमंत्र हो तो बता ."

                उसका दोस्त चटकारे ले - लेकर उसे एक एक टिप्स उसे बताता रहा. आखिर में उसका दोस्त जब बिदा हो रहा था तो उसने कहा, " लेकिन यार अगर लड़की पट गयी तो अकेले ही मत चटकर जाना. "

              " अमां यार कैसी बात करते हो. तुम तो अपने यार हो और भला मुझे कौन सी उस लड़की से शादी करनी है. बस थोडा सा प्यार का झांसा देकर उसे पटना है और अपना काम निकलते ही फुर्र ..."

              उसके दोस्त ने कहा , " यार उसका नाम पता तो कुछ बता . अगर उसका कोई फोटो तेरे पास हो तो दिखा, उसके चर्चे तेरे मुंह से सुनकर रहा नहीं जा रहा. "

              उसने उसने जैसे ही अपने मोबाईल में लड़की की चुपके से खींची गयी लड़की की फोटो अपने दोस्त को दिखाई , उसका दोस्त लड़की का फोटो देखते ही आग बबूला हो गया और जोर से चीखा, " साले मै तेरा खून पी जाऊंगा . ये तो मेरी बहन का फोटो है. ख़बरदार जो इसकी तरफ देखा तो . "

             उसके चेहरे की सारी रंगत गायब  हो चुकी  थी और पलभर में सन्नाटा पसरने  लगा . दोनों दोस्त अपने अपने रास्ते चल दिए थे.


Wednesday, December 14, 2011

साहब का कुत्ता

 हरिया का छोटा भाई काफी देर से जिद कर रहा था की  वह भी उसके साथ बाजार घूमने जायेगा उसकी मॉं ने भी कहा कि उसे भी ले जाकर उसे घूमा लाये मगर हरिया  है कि  नाम ही नहीं ले रहा था। उसने अपने छोटे भाई  की तरफ इशारा कर के कहा ‘‘ बड़ा घूमने चला हैं, नाक तो देख जरा कैसे बह रही है छि:  कितनी घिन रही है ,कोई  देखेगा तो क्या कहेगा । ऊपर से मुँह से कितनी बदबू आ रही है ’’
     हरिया अकेले ही बाजार जाने के लिए तैयार होने लगा वह जैसे ही बाहर निकला  कि  साहब जी बाहर कुत्ते को लेकर पार्क में टहलाते दिखाई दिये उसे देखते ही साहब जी ने कहा ‘‘ हरिया  इसे भी साथ लेकर बाजार जा और थोड़ी देर बाहर टहलाकर लाना।’’ 
     हरिया खुश था वह कुत्ते को लेकर बाहर निकल पडा़ कुछ दूर चलने के बाद उसने कुत्ते को पुचकारते हुए गोंद में में उठाया तथा फिर चूम लिया  उसकी चाल में निरंतर बादशाहत बढ़ती जा रही थी

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Thursday, June 23, 2011

लघुकथा : फाँसी की सजा

एक बहुत ही सम्पन्न तथा धन-धान्य से परिपूर्ण राज्य था। बाहरी लोगोँ ने राज्य को लूट-खसोट कर खोखला कर दिया। वर्तमान राजा सीधा साधा तथा भोला आदमी था। इसका फायदा उठाते हुये बेईमान दरबारियोँ तथा उच्च पदोँ पर बैठे लोगोँ ने राज्य को लूटकर अपना खजाना भरना प्रारम्भ कर दिया। जनता ने इसके खिलाफ आन्दोलन किया मगर राजा के सैनिकोँ द्वारा इसे कुचल दिया गया।
मगर कुछ ही दिनोँ बाद राज्य मेँ फैली दुर्व्यवस्था से तंग आकर जनता ने फिर एक बार राजा के खिलाफ आन्दोलन किया। इस बार जनता ने पिछली गलतियोँ से सबक लेते हुये संगठित होकर बड़े पैमाने पर आन्दोलन किया था।
फलस्वरुप राजा और उसके भ्रष्ट तंत्र को उखाड़ फेका गया। नये राजा ने सारे भ्रष्ट दरबारियोँ और लूटखोरोँ को जेल मेँ डाल दिया। उन पर मुकदमा चलाया गया तथा सबको फाँसी की सजा दी गयी।
इन लोगोँ ने नये राजा के समक्ष फाँसी की सजा को माफ करने की दया याचिका लेकर फरियाद की। नये राजा ने अपना निर्णय सुनाया, " इन सभी को राज्य की सीमाओँ की रक्षा कर रहे हमारे जवानोँ के साथ सिर्फ एक रात बिताते हुये यह देखना होगा कि जिस राज्य को ये लूट रहे थे उसकी रक्षा कितनी कठिनाईयोँ से की जाती है । अगली सुबह जो भी जिन्दा बच गया उसकी सजा माफ। "
राजाज्ञानुसार सभी लोगोँ तपते रेगिस्तानोँ, दुर्गम पहाड़ियोँ व ग्लेशियरोँ के बीच रह रहे जवानोँ के साथ छोड़ दिया गया। अगली सुबह एक भी आदमी ऐसा नहीँ मिला जिसकी सजा माफ हो सके। कोई लू से, कोई ठण्ड से , कोई भूख प्यास से तो कोई हार्टअटैक से मर चुका था।

Wednesday, March 16, 2011

लघु कथा--- आखिरी मुलाकात

             
       (अपनी लिखी एक पुरानी लघुकथा जो दैनिक 'हिंदी मिलाप'  में १० अगस्त २००२ को प्रकाशित हुई थी  ) 

                आज प्रेमी और प्रेमिका दोनों बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला करने के लिए मिले थे. प्रेमिका ने आँखों में घड़ियाली आँसू भरकर प्रेमी के सामने अपना रोना रोया , " डियर, मै तो तुम्हारे बिना जीने की कल्पना से ही कांप जाती हूँ , क्या करूँ ? मेरा खूसट  बाप हम दोनों के प्रेम के बीच में आ गया है. उसने किसी भी कीमत पर हम दोनों को एक न होने देने की कसम खा रखी है. अब मै अपने बाप के खिलाफ भी नहीं जा सकती . क्या ऐसा नहीं हो सकता की हम दोनों आपसी सहमति से अलग हो जाये ? "
                प्रेमिका की समझ में वैसे अपने बाप की सीख  बहुत जल्दी आ गयी थी. सच भी तो था, प्रेमी बेरोजगार था. शादी के बाद जिंदगी की गाड़ी आगे चलने के लिए तो  पैसे  की जरुरत पड़ेगी ऐस - आराम की जिंदगी बेरोजगार पति के सहारे मुश्किल थी. इसलिए वह  आज प्रेमी को साफ साफ मना कर देने का इरादा करके आई थी. 
               प्रेमी ने घबराने का नाटक करते हुए सीने पर हाथ रखकर कहा , " मेरी जान, ये तुम क्या कह रही हो,  तुम्हारे बिना तो मै ख़ुदकुशी कर लूँगा. "
               प्रेमी को तो बिलकुल यकीं ही नहीं हो रहा था . मानो  प्रेमिका ने उसके मन की बात छीन ली हो . पीछा छुड़ाने का इरादा तो वह भी आज करके आया था. बाप के पसंद की लड़की से शादी होते ही लड़की का बाप अपने विभाग में उसकी नौकरी लगाव देने का वादा किया था. प्रेमी मन ही मन खुश हो रहा था.
              लड़की ने सुबकते हुए कहा , मगर डियर, हम अकेले इस प्यार की दुश्मन दुनिया से कब तक लड़ पायेंगे, सच दुनिया वालों ने हम प्यार करने वालों के लिए कितने बंधन बना रखे है "
              " ठीक है मेरी जान,अगर तुम्हारे ख़ुशी के इतना कुछ किया तो आज क्या तुम्हारी ख़ुशी के लिए इस प्यार की कुर्बानी नहीं दे सकता. तुम्हारी ख़ुशी ही मेरी ख़ुशी है. मगर एक बार............ " प्रेमी की आँखों में वासना के कीडे तैर रहे थे.
               " ठीक है मगर आज के बाद तुम हमेशा के लिए मुझे भूल जाओगे "  प्रेमिका को तो जैसे यकीं ही नहीं हो रहा था की प्रेमी इतनी आसानी से पीछा छोड़ देगा. प्रेमिका को लगा की प्रेमी ने उसके मन की बात छीन ली. इतनी छोटी सी कीमत .अब सिर्फ इस एक मुलाकात के बाद बाप के पसंद के अमीरजादे  से शादी करने के लिए स्वतंत्र होगी. प्रेमिका ने स्वीकृति दे दी और दोनों एक दुसरे से लिपट गये. जिंदगी भर साथ जीने- मरने के  कसमें और वादे घुट- घुट कर दम तोड़ रहे थे.

Tuesday, December 7, 2010

छलिया प्रेमी

बहुतै  दिन से  हम सोंचत  रहनी की कौनों भोजपुरिया मिठास के साथ पोस्ट  ले आयीं. आज आपन पुरनका डायरी हाथ मे लागल तै आपन लिखल एक गो पहिली लघुकथा  हाथ लागल और उहो भोजपुरी  में , बस तै इकरा के आप लोगन के समने अवले  में तनिकों देर ना लागल............एक बात अऊर की ये कहानी के साथ एक गो अऊर कहानी जुडल बाये की जब ई अख़बार में छपे के खातिन गइल तै स्वीकृति तै हो गइल बके इकरा के हिंदी में तब्दील कैले के शर्त पर   . मगर हम दूसर कहानी भेंज दिहनीं बजाये एकरा में  तब्दीली के. काहे से की ई आपन के  पहिली लघुकथा रहल अऊर आज भी ई डायेरी के शोभा बाये ...( तै पेश बाय  आपन  ११ नव . १९९६  के लिखल पहिली लघुकथा  " छलिया प्रेमी "  )
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 सुबह जब  बुढाए  के साँझ के गोदी  सोवै  जात रहल तै वो बेला में रजमतिया के खेत के मेडी से गुजरत देख मिसिर के लौंडा रतन  के मन मचल गएल . आपन इशारा से रतन रजमतिया के मकई  के खेते में बुलावनै .
" ना बाब ना ,  केहू देख लेई तै का होई  " रजमतिया सकुचात  आपन बात कही के भागे  लागल.
" अरे नाहीं रे केहू देखि लेई तै का हो जाई. हम तै तोहरा से  पियार  करी  ला " रतन आपन  बाहीं कै सहारा देत रजमतिया से बोलनै.
" अगर कुछो गड़बड़ भई गयेल तब "
" तब का हम तोहरा से वियाह कई लेबी "
" अऊर  अगर जात बिरादरी कै चक्कर पड़ी गयेल तब "
" हम अपने साथै तुहके शहरवा भगा ले चालब ना........ " रतन रजमतिया के अपने  पहलु में समेटत कहने .
रजमतिया भी अब एतना आसरा  पाके मन से  गदगद हो गइल  और अपने भविष्य कै सपना सजावत   समर्पण कै दिहले.
कुछे देर बाद मिसिर बाबा अपने खेते के निगरानी बदे  वहां से गुजरने तै कुछ गड़बड़ कै आशंका तुरंते भाप  चिल्लैनन " कौने हई रे खेतवा में.. .. आज  लगत बाये कुल मकई टुटी  जाई ."
उधर रजमतिया के गाले  पै  रतन कै थप्पड़ पड़ल और चिलाये के कहनै ," दौड़िहा  बाबू जी हम रजमतिया के पकड़ लिहले बानीं ."  इ ससुरी आज मकई तोरै बदे खेत में घुसल रहे , " रजमतिया के तनिको  ना समझ  में आवत  की ई   का  होत बाये. मगर रतानवा  सब  समझ  गयेल रहेल की   अब  रजमतिया के ही चोर   साबित  कईके उ  रजमतिया से पीछा  छुड़ा  सकत  हवे . काहें के  की अब रजमतिया के भोगले के बाद अब उमें रतन कै तनिको इच्छा ना रही गएल रहल .  अऊर इसे उ बिल्कुले पाक साफ बच जात रहने अपने बाप    के नज़र मे.
फिर  तै  मिसिर  बाबा अऊर    रतन   दोनों  रजमतिया पै सोंटा और लात - घुसन    कै बौछार कई देहेनें. इधर रजमतिया छलिया प्रेमी के ठगल बस देखत रही गएल.

Wednesday, October 27, 2010

सार्थक जीवन


एक ही डाली से तीन फूल तोड़े गये .  पहला सुहागरात की सेज पर सजाया गया,  दूसरा भगवान के मंदिर मे  चढ़ाया गया तथा तीसरा एक शहीद की अर्थी पर सजाया गया .   
पहले और दूसरे फूल बहुत खुश थे और तीसरे फूल की किस्मत पर हंस रहे थे. पहले ने कटाक्ष करते हुए कहा , " मुझे दो आत्माओ के मिलन का साक्षी होने का सौभाग्य मिला है और मेरा जीवन धन्य हो गया तथा वहीं तुम एक लाश के ऊपर ... छि ..छि ... ऐसी जलालत किसी और को न मिले.
 दूसरे  फूल ने भी तीसरे पर कटाक्ष करते हुए कहा " मुझे तो भगवान के माथे  को चूमने का सौभाग्य मिला है. मै तो सीधा  स्वर्ग का अधिकारी हूँ.
तीसरा वाला  फूल शहीद की अर्थी के साथ साथ जल  गया शहीद  को स्वर्ग मे स्थान दिया जा रहा था. शहीद  ने स्वर्ग देवता से प्रार्थना की , " देव इस फूल ने आखिरी वक्त तक मेरा साथ दिया और मेरे साथ इसने भी अपनी शहादत दी है अतः यह भी स्वर्ग का अधिकारी होना चाहिए . "
पहला फूल अगली सुबह मसल- कुचल जाने के बाद घर  के पीछे एक नाली मे पड़ा आंसू  बहा रहा था , दूसरा फूल सुबह के साथ - साथ झाड़ू से बटोर कर कूड़ेदान मे डाला  जा चुका  था  और तीसरा  फूल अपनी शहादत  के साथ स्वर्ग मे स्थान पा चुका था.
                                                                                                   

Sunday, September 26, 2010

पहला साक्षात्कार ( लघु कथा )

( चित्र गूगल साभार )

अबोध शिशु की आँखों मे स्वप्निल संसार जन्म लेने लगा था. मुख मे दन्त क्या निकले की मानो पर निकल आये हों. वह उड़ना चाहता था, दुनिया देखना था. बच्चा अंजान था , उसकी इस कोशिश ने पहली बार शरारत की. उसने चपलता के साथ अपने दन्त माँ के स्तन मे गड़ा दिए.

माँ को पहले ही आशंका थी की स्तनपान से स्तन का आकर ख़राब हो सकता है. अब यह आशंका प्रबल हो गयी. माँ ने बच्चे के स्तनपान की आदत को छुड़ाने के लिए स्तन पर हरी मिर्च का टुकड़ा रगड़ दिया.

बच्चे ने जैसे ही स्तनपान करना चाहा वैसे ही उसका मन छनछना गया. मुख पूरी तरह से कसैला हो उठा. अबोध शिशु का पहली बार इस दुनिया की कडुआहट से साक्षात्कार हुआ.


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Sunday, August 22, 2010

अपराध बोध

" ये बब्बू ! बुरा तो नहीं मनोगे "
" नहीं बोल क्या बात है ? "
" अब आप यहाँ मत आया करो "
" क्यों क्या बात है , नाराज है मुझसे ?
"नहीं ये बात नहीं "
" तो फिर ? "
" हास्टल के लड़के मुझे चिंढाते है "
" क्या कहते है ?"
"आप को देख हमारी गरीबी का मजाक उड़ाते है ?"
इस बार बाप खामोश रहा ।
" मैं ही गाँव मिलने आ जाया करूंगा ?" कहकर बेटे ने अपना मुंह फेर लिया। उसकी आँखों में आंसू आ गया । लड़के को अपराध बोध मह्सुस हुआ की व्यर्थ ही बब्बू का दिल दुखाया ।
" ठीक है " बाप को अपना अपराध बोध मह्सुस हुआ कि उसे पहले ही यह बात ध्यान में आ जानी चाहिए थी।उसकी आँखों में आंसू छलक आयें मगर संतोष था कि उसका बेटा एक दिन इंजीनियर बनकर निकलेगा। अब वह फिर बेटे कि पढाई में बाधक नहीं बनेगा। उसने बेटे के सर पे हाथ फेर कर आशीर्वाद दिया और वापस लौट पड़ा।

Wednesday, June 9, 2010

गुस्सा

उसके पति उससे कह कर सोये थे कि सुबह - सुबह थोडा जल्दी जगा देना कल जल्दी ऑफिस जाना है । परन्तु सुबह उसकी भी नींद देर से खुली।
" रात भर क्या खाक छान रही थी जो सुबह जगा नहीं सकी " पतिदेव गुस्से में चीखे।
" रात में थोड़ा अच्छा सा सपना आ गया था ।"
" किस मजनूं के सपने देख रही थी , जरा में भी तो सुनूं। पति का गुस्सा बढता ही जा रहा था ।
" आज आप गुस्सा क्यों हो रहें हैं। सपने में हम तथा आप एक सुन्दर झील के किनारे.......।"
पति का गुस्सा कम होने लगा था तथा पत्नी ने राहत की सांस ली।

(प्रकाशित ०७ अप्रैल १९९९ हिन्दी देनीक " आज ")