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Tuesday, February 14, 2012

कुछ शायरियाँ

राज की एक बात कह गए वो छिपाने को मुझसे
"उपेन्द्र" लाख चाहकर भो वो  जिसे वह छिपा न सके थे.  

                             *   *    *

मत दिखाओ मुझे हसीं ख्वाब कोई अभी
" उपेन्द्र" बहुत बाकी है अभी उनके जुल्मों- सितम.

                             *   *    *

उन्हीं की जुल्फ थी उन्हीं का साया भी था
"उपेन्द्र " उन्हीं से हमने अपना चेहरा भी छुपाया था.

                             *   *    *

वो देती  रहीं दस्तक बार बार मेरे दरवाजे पर
" उपेन्द्र" मै समझता रहा ये हवा के थपेड़े होंगे.

                            *   *    *

राज की एक बात थी वह पीछे पड़ गए बताने के लिए.
"उपेन्द्र"  खामोश रहे हम जिसे वर्षों तक छिपाने के लिए.

Saturday, October 9, 2010

साकी के नाम

एक

एक साकी ही तो था मेरा अपना कहलाने वाला
अब वह भी शराब मे पानी मिलाने लगा है
गम जो हम भुला लेते थे कभी पीकर शराब
अब
वो फिर से मुझे सताने लगा है । ।

दो

जिंदगी हुई कुछ इस तरह से बसर साकी
हम पीते गए तुम पिलाते गए
खूब छककर पिया खूब जमकर पिया
मगर गए तो फिर भी प्यासे गए

.

Friday, August 20, 2010

कुछ शायरियां

शायरी _१


मुस्करा उठता है सारा जमाना
उनकी ईक मुस्कराहट पर
थोडा सा हम जो मुस्करा दिये
"उपेन्द्र " तो वो रूठ गये बुरा मान कर ।।

शायरी _२

कल रात कटी बडी मुस्किल से
आज न जाने क्या हाल होगा ।
मगर अफसोस मेरी इस बेबशी का
"उपेन्द्र" उनको न जरा भी ख्याल होगा।।

शायरी _३

नाराज होकर वो चले गये वों आज मुझसे
बोलते थे दिल चीरकर दिखाइये तो यकीं आये
मैं डरता रहा कि अगर दिल चीरकर दिखाया तो "उपेन्द्र"
कहीं उनकी तस्वीर निकलकर धूल में ना गिर जाये ।।

शायरी _४

दुशमनों से क्या उम्मीद उनका काम ही था जलाना
वह चले गये घर हमारा जलाकर
अब उम्मीद अपने दोस्तों पर "उपेन्द्र"
मगर सब तमाशा देख रहे थे तालियां बजाकर ।।

कुछ शायरियां

शायरी _१


मुस्करा उठता है सारा जमाना
उनकी ईक मुस्कराहट पर
थोडा सा हम जो मुस्करा दिये
"उपेन्द्र " तो वो रूठ गये बुरा मान कर ।।

शायरी _२

कल रात कटी बडी मुस्किल से
आज न जाने क्या हाल होगा ।
मगर अफसोस मेरी इस बेबशी का
"उपेन्द्र" उनको न जरा भी ख्याल होगा।।

शायरी _३

नाराज होकर वो चले गये वों आज मुझसे
बोलते थे दिल चीरकर दिखाइये तो यकीं आये
मैं डरता रहा कि अगर दिल चीरकर दिखाया तो "उपेन्द्र"
कहीं उनकी तस्वीर निकलकर धूल में ना गिर जाये ।।

शायरी _४

दुशमनों से क्या उम्मीद उनका काम ही था जलाना
वह चले गये घर हमारा जलाकर
अब उम्मीद अपने दोस्तों पर "उपेन्द्र"
मगर सब तमाशा देख रहे थे तालियां बजाकर ।।