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Saturday, August 12, 2023

जिंदगी की हकीकत

चलो आज मरते है

एक मौत

झूठ-मूठ की 

और देखते है

कितना अलग है

जिन्दगी रोज से

कितने लोग सच में रोते है

और कितने हमदर्द खुश होते है

पता तो चले हम जिन्दगी भर

परेशान रहे जिनके लिए

वो कितना परेशान है हमारे लिए

देखे इस जिन्दगी की

हकीकत क्या है।

Saturday, July 1, 2017

गाँव

चलो
अब लौट चले
वापस  अपने गाँव
जहाँ दिन की दुपहरी होगी
और नीम की छाँव

मक्के की तुम रोटी लाना
और सरसो का साग
ठंडी ठंडी पुरवईया में
मैं छेंडूगा
बिरहे का राग

जहाँ बचपन की होगी
मीठी यादें
दादा दादी के किस्से
खेल-खेल में
बनते और बिगड़ते
गुड्डा-गुड्डी के रिश्ते

जहाँ शहर की मारकाट से
दूर कहीं होंगी
अपने गाँवो  की गलियाँ
पनघट पर बैठ करेंगे
जीभर अठखेलियाँ

जहाँ छत भी अपनी होगी
सारा आसमाँ  अपना
अपने आँगन में
होगी चांदनी रातें
तुम सपनों में आ जाना
हम करेंगे मीठी बातें

अब ये शहर बेगाना लगता है
बेगाने से भाव
चलो
अब लौट चलें
वापस अपने गाँव ।।



Wednesday, September 14, 2016

रोटी

रोटी
सिर्फ रोटी नहीं
तपन
तुम्हारे सपनो की
मिठास
तुम्हारे प्यार की
कारीगरी
तुम्हारे हाथो की
उम्मीद
तुम्हारे ख्वाबो की
और स्वाद
तुम्हारे तानो का
सच कितना कुछ है
तुम्हारी इस रोटी में।


Friday, September 9, 2016

पीड़ा


तुम कहो
या न कहो
रोटी
बता देती है
तुम्हारी पीड़ा
जिस दिन
ज्यादा जली
ज्यादा पीड़ा
कम जली
कम पीड़ा
नहीं जली
यानी ठीक हो
मगर इतनी भी ख़ामोशी
अब ठीक नहीं
बहुत दिन हो गए
खाये बिन जली रोटी।

Saturday, July 16, 2016

जिंदगी


आज खुला छोड़ दिया है
हमने दरवाजे
अपनी जिंदगी के
जो रुकना चाहता है रुके
स्वागत है
वरना बेहतर है
चले जाना दूर
रोज रोज की किच किच से
ताकि कल से कोई
शिकायत न रहे
थक गया हू जिंदगी
अब तू भी ले फुरसत
और मुझे भी जीने दे
फुरसत के कुछ पल।

Tuesday, January 20, 2015

उम्मीद

दिन के
सारे दर्द
वो पी गया
इस उम्मीद में कि
रात का चाँद
हाेगा शायद
बहुत खूबसूरत
और रात के दर्द
इस उम्मीद में कि
अगले दिन होगी
ईक नई सुबह
ये उम्मीद है तो
ये जिन्दगी है
और जिन्दगी से
खूबसूरत
शायद कुछ भी नहीं ....

Thursday, January 1, 2015

नया साल

कैसा होगा 
नया  साल 
नफ़रत भरा
या प्यार 
रंग भरा 
या  बदरंग 
उम्मीदें  होगी पूरी 
या फिर टूटेंगी 
सच में कुछ बदलेगा 
या हर बार  की तरह 
बदल जाएगी 
इस बार भी 
दीवाल पर टंगी 
पंचांग की तस्वीर 
जो भी हो 
बस पिछले साल 
जो टूटे थे सबके 
उम्मीदों के पंख 
वो निकल आये फिर से
और इस बार न टूटे …  



आप सबको नए साल की हार्दिक शुभकामनायें 

Friday, December 26, 2014

माँ

         1
जब जब मै  गिरता रहा
माँ मझे अकेला
हर बार छोड़ती रही
मै खुद कोशिश करता
उठकर सम्हलने की
और जब भी उठकर खड़ा होता
माँ मुझे चूम लेती
सच आज भी जब जिंदगी
गिरा देती है
वक्त की सीढ़ियों से
मुड़कर देखा हूँ माँ की तस्वीर
और पुनः खड़ा हो जाता हूँ
 एक नए जोश से
और चूम लेता हूँ
माँ की तस्वीर
उठती  है मन में एक कसक
क्यों मै  बड़ा  बन गया
माँ काश मै  फिर से
वो बच्चा बन पाता ।।

     2..
तुम्हारा यूँ  चले जाना
निश्चय ही छोड़ देता है
निराशा  के अँधेरे में
मगर ,
अक्सर लगता है कि
तुम एक ज्योति बन
उन्हें चीर देती हो
ताकि  मै  आगे बढ़ सकू

3...

तुम्हारे जलाये दिये
आज भी जल रहे है
और अँधेरा उन्हें
छू भी  नहीं पा रहा
पता है क्यों …
तुम्हारे सपने मरे नहीं
मैं  उन  सपनों  के संग
आज भी सोता
और जागता  हूँ ।





Monday, December 17, 2012

लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया के लिए चंद पंक्तियाँ

आज बेचैन हूँ
पूरा दिन ढूंढ़ता रहा
किताबों का वो पन्ना 
जहाँ लिखा हुआ
कभी पढ़ा था
शहीदों की चिताओं पर
लगेंगे हर वर्ष मेले
मगर नहीं मिला वो पन्ना
कहीं धूल खा रहीं होगी
हमारी याददास्त भी
उन पन्नों की ही तरह
हम भूलते गए उन्हें
उनके परिजन होते रहे
दर-बदर अकेले

कहाँ हमें करना था इन्हें
दिलो-जान से प्यार
हम करते रहें इन्हें
पहचानने से भी इंकार
दिल पर लगे घाव
मां  के बहते आँसू पोंछ
हमें भाई-बहना की
उम्मीद को जगाना था
मगर हमने अदा की कीमत
कुछ को पेट्रोल पम्प
कुछ को गैस एजेंसी
और प्लाट बाँट  
हमने समझा
अपने कर्तव्यों की इतिश्री
वो भी आधे कागजों पर
और आधी हकीकत 

साल में एक बार
ढोल- बाजों के साथ
याद  कर लेना
देशभक्ति के गीत गा लेना
नहीं हो जाता इससे
शहीदों का सम्मान
पता नहीं ये सम्मान
जुबां  से दिल तक कभी
उतर पायेगा या नहीं ......




 ( कारगिल युद्ध 1999 में शहीद होने वाले 4 जाट रेजिमेंट के लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया का जन्म हिमांचल प्रदेश के पालनपुर में 29 जून 1976 में हुआ था . कारगिल युद्ध के समय पाकिस्तान  ने इन्हें इनके पांच साथियों, सिपाही अर्जुन राम ( नागौर , राजस्थान), सिपाही भंवर लाल बागडिया ( सीकर, राजस्थान) सिपाही भीखाराम ( बाड़मेर, राजस्थान ),सिपाही मूलाराम ( नागौर, राजस्थान ) और सिपाही नरेश सिंह ( अलीगढ, उत्तर प्रदेश) के साथ सीमा पर गस्त के दौरान घेरकर अपहरण कर लिया और 22 दिन अपनी कस्टडी में टार्चर  करने के बाद इन्हें मारकर  भारतीय सीमा में फेंक दिया। इन सबको बर्बर यातनाये दी गयी और इनके नाख़ून , आँखे निकाल ली गयी थी और सर धड से अलग करके क्षत- विक्षत हालत में भारतीय सीमा में फेंका गया था .
   इस  घटना के बाद लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया के पिता श्री नरेन्द्र कालिया को दिल का दौरा  पड़ा और  कुछ दिनों बाद उनकी नौकरी जाती रही। आजकल वो सरकार  द्वारा  दी गयी एक गैस एजेंसी के सहारे अपना और अपने परिवार का पालन पोषण कर रहे है। अपने बेटे के कातिलों को सजा दिलवाने के लिए हर तरफ से हारकर और सरकारी रवैये से निराश होकर वे हेग के अंतर्राष्ट्रीय न्यायलय में इसे ले जाने की कोशिश में लगे है । पाकिस्तानी सेना ने इन युद्ध बंदियों के साथ जो बर्बरतापूर्ण कार्यवाही की वह हर तरफ  से अंतर्राष्ट्रीय संधि और युद्ध अधिनियम का सरेआम उल्लंघन था।

Friday, November 30, 2012

अतिथि तुम कब जाओगे

सर्दी खांसी और जुखाम 
आजकल है ये मेरे मेहमान 
तीन दिनों से पैर टिकाये 
नहीं ले रहे जाने का नाम ।। 

तीनों आये है पूरी तयारी संग
कोई दिखता नहीं किसी से कम  
दिन रात  है इनका पहरा ऐसा 
बंद हुई खुशिओं की दुकान।।

शैतानी इनकी हरदम रहती जारी 
नहीं मानते ये किसी की बात 
जब डाक्टर आकर इनको धमकाता 
ये बन जाते बिलकुल अन्जान।। 

जब ये फरमाते है थोडा आराम 
हमें भी मिलती है थोड़ी राहत 
वरना इनकी जी-हुजूरी में 
फंसी हुई है अपनी जान।। 

बार- बार पूछता हूँ इनसे 
अतिथि तुम कब जाओगे 
ये मुस्कराकर देते है जबाब 
बहुत दिन बाद मिले हो जजमान

सर्दी खांसी और जुखाम 
आजकल है ये मेरे मेहमान ।।

Thursday, October 4, 2012

हिस्सा

लाख कोशिशों के बाद भी
नहीं बचा पाए थे डाक्टर 
स्वास्थ्य मंत्री जी को ,
पोस्ट मार्टम की रिपोर्ट ने   
सभी को चौकाया था 
मंत्री जी को दी गयी दवा ने 
दवा ने नहीं 
बल्कि जहर का काम किया था ,
मृत्यु की वजह निकली 
नकली दवाइयां ,
स्वास्थ्य विभाग सदमे में है 
मंत्री जी का सचिव उहापोह की स्थिति में है 
की दवा कंपनी से मिला 
इस बार का कमीशन 
खुद ही रख ले या 
फिर मंत्री जी की पत्नी को 
मंत्री जी का हिस्सा 
पहुंचा दिया जाय ....

Sunday, September 9, 2012

कफ़न


मेरे हाथों से 
कफ़न का कपड़ा 
वह छीनकर भागा
पता चला 
उसकी बूढ़ी माँ
कई दिनों से
कंपकपाती ठण्ड में
बिन चादर के  
रात भर 
सो नहीं प़ा रही थी  ।।


Sunday, May 27, 2012

कुछ क्षणिकायें

खंजर 
ये  खुदा 
एक गुजारिश  है तुमसे 
अगली बार खंजर 
उनके हाथों में 
थमाने से पहले 
न भूल जाना 
इस दिल को पत्थर  बनाना 

ताजमहल 
इतना  भी इतराना 
ठीक नहीं 
अपनी इस सुन्दरता पर 
न काटे  गए होते 
हाथ कारीगरों के 
तो आज हर घर 
इक ताजमहल रहा होता

मुस्कराहट एक गुनाह 
ये मुस्कराहट 
चली जाये तो 
सन्नाटा 
आ जाये तो 
गुनाह 
उन्हें गुनाह पसंद नहीं 
और हमें सन्नाटा 
इस तरह बढती रही 
हमारे गुनाहों की संख्या 

प्यार 
सिर्फ ढाई आखर 
उनके लिए 
जो शब्दों को देते है मोल 
जिया जाय तो कम है 
सात जन्म भी 
समझने  के लिए



                                                 कुछ तस्वीरें गाँव की

Sunday, January 8, 2012

जिंदगी

जिन्दगी- सात

कमबख्त
जिन्दगी होने  लगी है
और भी मुश्किल से बसर
जबसे ख्यालों में
वो आजकल 
आने लगे है अक्सर ।।

जिन्दगी- आठ  

दोस्त क्या मिला है
किसको यहाँ
ये तो मुकद्दर
की बात है
वरना जिन्दगी यहाँ है
सिर्फ दो पलों की
एक छोटी सी मुलाकात ।।

जिन्दगी- नौ 

बात जिन्दगी की
वो किये थे
खुद ही शुरू
मगर
जब हम सुनाने लगे
अपनी जिंदगी के हाल
 वो रो दिए थे ।।

जिन्दगी- दस 

जिन्दगी पुरी
गुजर गयी
उस एक जख्म को
सिर्फ सहलाने में
जो दे गए थे वो
पल भर के
मन बहलाने में ।।

                        जिंदगी- एक से छः

.

Sunday, December 25, 2011

रविवार : बस आनंद ही आनंद

रविवार पर दो कवितायें:  एक ये जो 17 साल पहले की बाल कविता .......


(६ नवम्बर १९९४  को इलाहाबाद के " प्रयागराज टाईम्स " में प्रकाशित बाल कविता )

                  और एक ये जो आज की  (रविवार का एक मीठा एहसास )........
 रविवार : बस आनंद ही आनंद

रविवार !
यानि सुबह के मोबाईल के 
अलार्म की टिन- टिन से छुट्टी
और देर तक सुबह की 
मीठी नींद का आनंद 
बस आनंद ही आनंद

न सड़क पर
ट्रैफिक की चिंता
न आफिस पहुँचने की जल्दबाजी
न बास की खिंच - खिंच 
न सहयोगियों की चिख -चिख 
और  न फाईलों की टेंशन
वाह रे सुकून भरा आनंद      
बस आनंद ही आनंद

न फोन सिर  पर 
घनघना पा रहा 
न काम का बोझ दबा पा रहा 
सप्ताह के इस दिन 
बस चलती है हमारी मर्जी 
अजी आज के राजा है हम 
कहाँ मिलेगा ऐसा आनंद
बस आनंद ही आनंद

नहाने के बाद
छत पर गुनगुनी धुप का 
मीठा एहसास
गरमा गरम आलू पराठा
दे रहा नाश्ते का आनंद
बस आनंद ही आनंद

बच्चों का  स्कूल का विंटर कैम्प
उनकी अम्मा की किट्टी   
वाह रे सुकून भरा दिन 
बस इस रजाई में दुबककर 
ये बीत रहा दिन 
एक असीम शांति का आनंद
बस आनंद ही आनंद



ब्लॉग परिवार के सभी सदस्यों को क्रिसमस की हार्दिक बधाई और शुभकामनायें

Saturday, September 17, 2011

प्रिय मित्रों और आदरणीय जनों

कुछ व्यक्तिगत कारणों  और समयाभाव के कारण अभी आर्कुट, फेसबुक  और ब्लॉग पर उपलब्ध नहीं रह पाउँगा और वापसी के बारे में अभी  कुछ कह नहीं सकता.  आप सभी लोंगों का ये प्यार  मुझे परेशां बहुत करेगा  क्योंकि आप लोंगों ने जो डेढ़ साल की ब्लोग्गिं  में इतना अथाह प्यार जो दे दिया वो इतनी आसानी से मुझसे नहीं सम्हल पा रहा. इतने ढेर सारे प्यार के लिए तहे दिल से शुक्रिया.........
कुछ शब्द और .......
फूलों और काँटों का
साथ साथ रहना
कैसा ये अजीब संयोग 
बनाया है खुदा तुमने
जिसकी खुशबू  हमें लगती है
जितना  ज्यादा अच्छी
काँटों को उतना ही 
         गले लगाना पड़ता है......... 

Wednesday, September 14, 2011

हिंदी- दिवस



हिंदी- दिवस के
शुभ अवसर पर
हिंदी को प्रोत्साहित करने के लिए
हुआ था एक सभा का आयोजन
अतिथि महोदय पधारे थे
मंच पर धीरे धीरे
मुस्कराते हुए
फूल मालाओं के बीच
भाषण की शुरुआत की थी
उन्होंने अपने की छोटे से
परिचय के साथ -
" डिअर ब्रदर्स एंड सिस्टर्स
प्यारे से मेरे फ्रैन्डस मुझे
जे. के. साहब के नामे से पुकारते है
मैं तो कोई ज्यादा
पढ़ - लिख नहीं पाया था
पर, मेरा बेटा कैम्ब्रिज युनिवर्सिटी से
पी. एच. डी. कर रहा है.....।"

Thursday, July 21, 2011

जो लौट के घर ना आयें......(कारगिल युद्द - मई से जुलाई 1999 )

जो लौट के घर ना आयें......

दुश्मनों को  इस सरजमीं से खदेड़ हमने अपना वादा निभाया
लो सम्हालो ये देश प्यारों अब अलविदा कहने  का वक्त आया .।।
आजाद है अब ये सरहद हमारी हौसले दुश्मनों के पस्त हुए 
मुश्किल परिस्थितियों में भी हमने उन्हें यहाँ से मार भगाया ।।
नापाक इरादे लेकर आये थे वे पलभर में हमने खाक कर दिया   
 हर चोटी पर फिर से हमने अपना झंडा ये तिरंगा फहराया ।।
इसे सम्हाल कर रखना हरदम क़ुर्बानी  फिर बेकार न जाये 
दुश्मन के नापाक परछाईयों  की फिर न पड़े कभी छायां।।
बस  भूल  न  जाना  उन्हें  जो  लौट  के  घर ना  आये 
जिसने लगा दी जान की बाजी और सब कुछ अपना गवाया ।।


Thursday, April 21, 2011

अन्ना हजारे के आन्दोलन के सन्दर्भ में : " अब क्या होगा ? "

चित्र गूगल साभार  
अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार के खिलाफ और जन लोकपाल बिल के लिए किये जा रहे आन्दोलन के सन्दर्भ में.................
अब क्या होगा - १
हिल गयी हैं 
सत्ता की जड़े 
खलबली मची है 
भ्रष्टाचारियों से 
भरी हुई सत्ता में
अब क्या होगा 
सोये  हुओं के 
जाग जाने के बाद ? 

अब क्या होगा -२ 
बड़ी मछलियाँ 
व्यस्त थी 
छोटी मछलियों को
खाने में
उनके हक छिनने में.
उन्हें लूटने में
एक कंकड़ उछाला है किसी ने 
शांत जल में 
बड़ी बेचैनी है 
खलबलाहट है
बड़ी मछलियों को 
डर सताने लगा है
कि कहीं ये भँवर का रूप न लेले
वो परेशान हैं कि
अब क्या होगा 
सोये  हुओं के 
जाग जाने के बाद ?

अब क्या होगा -३ 
जंतर -मंतर पर
जब जारी था तुम्हारा अनशन
तुम भूख से तड़पे तो होगे जरूर
मगर इस तड़प  से ज्यादा
वह तड़प रही होगी
जो तड़प रहे थे
इस वजह से
रातों की नींद उड़ जाने के बाद
क्योकि उन्हें डर सता रहा था कि
अब क्या होगा 
सोये  हुओं के 
जाग जाने के बाद ?

अब क्या होगा -४ 
सत्ता है
शतरंज  की बिसात
जारी है और जारी रहेगा
शह और मात का खेल
आरोप और प्रत्यारोप का दौर
कड़ियों को जोड़ने और तोड़ने का खेल
राह लगती नहीं आसन
मगर अन्ना हजारे
असली आजादी का
जो अलख जलाया है तुमने
अब जागने लगा है
सोया हिंदुस्तान
कुछ लोंगों के माथे पर बल पड़ने लगे हैं कि
अब क्या होगा 
सोये  हुओं के 
जाग जाने के बाद ?

Sunday, January 2, 2011

बचपन की तस्वीर

My son's Photo

सुबह से  शाम तक की 
व्यस्त भाग दौड़ 
बदल डालती है चेहरे की रंगत 
बोझिल मन थोड़ा सा भी 
अगर  पाता है फुरसत
तो घेर लेते है अनेकों  ख्यालात
ऐसे में जब कभी भी 
दिवार पर टंगी 
बचपन के तस्वीर की तरफ
जाती है  नज़र 
तो बरबस ही मन  खिंच  जाता है 
भोली भाली चिंतामुक्त 
हँसती तस्वीर की तरफ
और न चाहते हुए भी
फूट पड़ती है हंसी  
जिंदगी घूम फिर  कर
एक ही बिंदु पर केन्द्रित 
होती रहती है
कितना प्यारा था बचपना 
आने लगते है याद 
बचपन के पुराने दिन
और अन्दर ही अन्दर
यह जख्म उठता   है
कि क्यों  नहीं हम
बचपना  वापस पा लेते ..