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Friday, December 26, 2014

माँ

         1
जब जब मै  गिरता रहा
माँ मझे अकेला
हर बार छोड़ती रही
मै खुद कोशिश करता
उठकर सम्हलने की
और जब भी उठकर खड़ा होता
माँ मुझे चूम लेती
सच आज भी जब जिंदगी
गिरा देती है
वक्त की सीढ़ियों से
मुड़कर देखा हूँ माँ की तस्वीर
और पुनः खड़ा हो जाता हूँ
 एक नए जोश से
और चूम लेता हूँ
माँ की तस्वीर
उठती  है मन में एक कसक
क्यों मै  बड़ा  बन गया
माँ काश मै  फिर से
वो बच्चा बन पाता ।।

     2..
तुम्हारा यूँ  चले जाना
निश्चय ही छोड़ देता है
निराशा  के अँधेरे में
मगर ,
अक्सर लगता है कि
तुम एक ज्योति बन
उन्हें चीर देती हो
ताकि  मै  आगे बढ़ सकू

3...

तुम्हारे जलाये दिये
आज भी जल रहे है
और अँधेरा उन्हें
छू भी  नहीं पा रहा
पता है क्यों …
तुम्हारे सपने मरे नहीं
मैं  उन  सपनों  के संग
आज भी सोता
और जागता  हूँ ।





Friday, March 15, 2013

कुछ क्षणिकायें


१. 

हथियारों के दलाल  
खा गए सब हथियार 
सुना है कि 
फौजी लड़ते है 
लाठी और गुलेल से।।

२. 

कुछ गरीब और आदिवासी 
रोजी रोटी के लिए 
फ़ौज में भर्ती हुए थे 
सुना है कि 
उनकी शहादत पर 
उनके झोपड़े को आलिशान महल 
बना देने की तयारी है।। 


३. 

ना कोई हंगामा हुआ 
ना  किसी ने पत्थर फेंके 
ना कर्फ्यू लगाने की जरुरत पड़ी 
और ना  ही किसी ने मोमबत्तियाँ जलायी 
सुना है कि 
अभी अभी कुछ फौजियों की 
अंतिम यात्रा यहाँ से गुजरी है।। 

४. 

आज भारत बंद नहीं है 
सिर्फ कुछ जवान ही तो मरे है 
सुना है कि 
धर्मनिरपेक्ष और मानवतावादी 
कुछ दिनों की छुट्टियों पर 
आराम फरमाने निकल पड़े है 
थक गए थे बेचारे
वैसे भी ये तो उन फौजियों का फर्ज था 
किसी मानवाधिकार का उलंघन नहीं।। 

१३ मार्च को श्रीनगर में शहीद हुए इन जवानों को सलाम और अश्रुपूरित विदाई 


(Photo courtesy: Indian army fans)

Monday, December 24, 2012

कुछ क्षणिकायें

याद

हम तो थे परिंदा
हमारी हर उड़ान के साथ
अपने लोग भी हमें
अपने दिलों से
उड़ाते गये
आलम अब ये है की
हम याद भी करें तो 
उनको याद नहीं आते है।। 

जख्म

हमें आदत थी
उनके हर चीज को
सम्हालकर रखने की
उनके दिए हर दर्द को भी
हम दिल में
सम्हालकर रखते गए
और जख्म  खाते रहें।।


इल्जाम 

उनके हर इल्जाम 
हम अपने सर लेते गये
इस उम्मीद में की 
यह होगा
आखिरी इल्जाम ।।

रेत

जबसे रेत पर मैंने
तुम्हारा नाम लिखा है
तुमने छोड़ दिया है 
लहर बनकर 
किनारे तक आना ।।

बगिया के फूल

मेरी बगिया में गिरे 
कोमल फूल 
आज बड़े उदास है
कि वो आये 
और बिन मुस्कराए 
लौट गए 
कहीं उनके 
कोमल पैरों में 
छाले तो नहीं 
पड़ गये होंगे ।।




Monday, December 17, 2012

लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया के लिए चंद पंक्तियाँ

आज बेचैन हूँ
पूरा दिन ढूंढ़ता रहा
किताबों का वो पन्ना 
जहाँ लिखा हुआ
कभी पढ़ा था
शहीदों की चिताओं पर
लगेंगे हर वर्ष मेले
मगर नहीं मिला वो पन्ना
कहीं धूल खा रहीं होगी
हमारी याददास्त भी
उन पन्नों की ही तरह
हम भूलते गए उन्हें
उनके परिजन होते रहे
दर-बदर अकेले

कहाँ हमें करना था इन्हें
दिलो-जान से प्यार
हम करते रहें इन्हें
पहचानने से भी इंकार
दिल पर लगे घाव
मां  के बहते आँसू पोंछ
हमें भाई-बहना की
उम्मीद को जगाना था
मगर हमने अदा की कीमत
कुछ को पेट्रोल पम्प
कुछ को गैस एजेंसी
और प्लाट बाँट  
हमने समझा
अपने कर्तव्यों की इतिश्री
वो भी आधे कागजों पर
और आधी हकीकत 

साल में एक बार
ढोल- बाजों के साथ
याद  कर लेना
देशभक्ति के गीत गा लेना
नहीं हो जाता इससे
शहीदों का सम्मान
पता नहीं ये सम्मान
जुबां  से दिल तक कभी
उतर पायेगा या नहीं ......




 ( कारगिल युद्ध 1999 में शहीद होने वाले 4 जाट रेजिमेंट के लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया का जन्म हिमांचल प्रदेश के पालनपुर में 29 जून 1976 में हुआ था . कारगिल युद्ध के समय पाकिस्तान  ने इन्हें इनके पांच साथियों, सिपाही अर्जुन राम ( नागौर , राजस्थान), सिपाही भंवर लाल बागडिया ( सीकर, राजस्थान) सिपाही भीखाराम ( बाड़मेर, राजस्थान ),सिपाही मूलाराम ( नागौर, राजस्थान ) और सिपाही नरेश सिंह ( अलीगढ, उत्तर प्रदेश) के साथ सीमा पर गस्त के दौरान घेरकर अपहरण कर लिया और 22 दिन अपनी कस्टडी में टार्चर  करने के बाद इन्हें मारकर  भारतीय सीमा में फेंक दिया। इन सबको बर्बर यातनाये दी गयी और इनके नाख़ून , आँखे निकाल ली गयी थी और सर धड से अलग करके क्षत- विक्षत हालत में भारतीय सीमा में फेंका गया था .
   इस  घटना के बाद लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया के पिता श्री नरेन्द्र कालिया को दिल का दौरा  पड़ा और  कुछ दिनों बाद उनकी नौकरी जाती रही। आजकल वो सरकार  द्वारा  दी गयी एक गैस एजेंसी के सहारे अपना और अपने परिवार का पालन पोषण कर रहे है। अपने बेटे के कातिलों को सजा दिलवाने के लिए हर तरफ से हारकर और सरकारी रवैये से निराश होकर वे हेग के अंतर्राष्ट्रीय न्यायलय में इसे ले जाने की कोशिश में लगे है । पाकिस्तानी सेना ने इन युद्ध बंदियों के साथ जो बर्बरतापूर्ण कार्यवाही की वह हर तरफ  से अंतर्राष्ट्रीय संधि और युद्ध अधिनियम का सरेआम उल्लंघन था।

Friday, November 30, 2012

अतिथि तुम कब जाओगे

सर्दी खांसी और जुखाम 
आजकल है ये मेरे मेहमान 
तीन दिनों से पैर टिकाये 
नहीं ले रहे जाने का नाम ।। 

तीनों आये है पूरी तयारी संग
कोई दिखता नहीं किसी से कम  
दिन रात  है इनका पहरा ऐसा 
बंद हुई खुशिओं की दुकान।।

शैतानी इनकी हरदम रहती जारी 
नहीं मानते ये किसी की बात 
जब डाक्टर आकर इनको धमकाता 
ये बन जाते बिलकुल अन्जान।। 

जब ये फरमाते है थोडा आराम 
हमें भी मिलती है थोड़ी राहत 
वरना इनकी जी-हुजूरी में 
फंसी हुई है अपनी जान।। 

बार- बार पूछता हूँ इनसे 
अतिथि तुम कब जाओगे 
ये मुस्कराकर देते है जबाब 
बहुत दिन बाद मिले हो जजमान

सर्दी खांसी और जुखाम 
आजकल है ये मेरे मेहमान ।।

Sunday, November 25, 2012

हरकीरत हीर जी के काव्य संग्रह " दर्द की महक " और "सरस्वती सुमन" पत्रिका के क्षणिका विशेषांक के लोकार्पण की कुछ झलकियाँ


कल 24 नवम्बर को गुवाहाटी प्रेस क्लब में हरकीरत हीर जी के काव्य संग्रह " दर्द की महक " और उनके ही संपादन में निकली देहरादून से प्रकाशित होने वाली  "सरस्वती सुमन" पत्रिका के क्षणिका विशेषांक  का लोकार्पण हुआ। 


 इस अवसर की कुछ झलकियाँ :-

बाये से- श्री आनंद सुमन सिंह , श्री जी एम श्रीवास्तव जी, श्री किशोर जैन जी, श्रीमती सुधा श्रीवास्तव जी और श्रीमती हरकीरत हीर जी 

सरस्वती सुमन के क्षणिका विशेषांक का विमोचन 

हीर जी द्वारा रचित काव्य संग्रह " दर्द की महक" का विमोचन 



"दर्द की महक" का आवरण पृष्ट 

 "दैनिक पूर्वोदय" में ये खबर 


Tuesday, October 23, 2012

कुछ क्षणिकायें



1.   लोकतंत्र 

लोकतंत्र ने पूछा 
इसबार किसपर 
लगाओगे  मुहर
मतदाता  मुस्कराता है
महँगी होगी जिसकी शराब
लोकतंत्र बेचारा 
फिर हो जाता है उदास ।।

2.  असमंजस

भगवान बड़े असमंजस में है
कि किसकी सुने
सौ तोले का सोने का हार
भक्त ने आज ही चढ़ाया है
कि धंधा खूब फले- फूले
भक्त के कसाईखाने में
कटने को तैयार गाय की गुहार थी       
हे भगवन मुझे बचा ले ...।।

3 .  दहेज़-हत्या 

नेताजी का तर्क था
जब सारा देश
नाच सकता है
हमारी उंगुलियों पर 
तब हमारी बहू भला 
क्यों नहीं नाची..?

4.   पीढ़ी-दर-पीढ़ी 

तुम्हारे बाप ने 
जिस जिन्दगी को 
तलाश  किया था 
दूध की कटोरियों में 
तुमने उसी जिन्दगी को पाया 
पेप्सी और कोका-कोला से 
भरी बोतलों में
आज तुम्हाता बेटा ढूंढ़ रहा है
उसी जिन्दगी को 
शराब और बीयर की बोतलों में ।।

5.  जख्म

जिन्दगी पुरी
गुजर गयी
उस एक जख्म को
सिर्फ सहलाने में
जो दे गए थे वो
पल भर के 
मन बहलाने को ।।

6. चुनाव के बाद

अब पाँच  साल तक नंगे  रह लेना
फिर आकर ये साड़ी बाँटेगे
छलकेगें दारू के जाम
तब तक प्यासे रह लेना 
नोटों की अगली बारिश तक
बस कंकड़ - पत्थर गिनते रहना । 

(सरस्वती सुमन के क्षणिका विशेषांक में ये मेरी भी कुछ क्षणिकायें



Saturday, October 13, 2012

बस कुछ यूँ ही (कुछ क्षणिकायें )

गुरुर 

एक मुद्दत के बाद
हम मिले थे
कल एक मोडपर
फिर भी
न पूछे गए
एक दूसरे के
हालचाल
कुछ हम थे व्यस्त
अपने पुराने जख्म
सहलाने में
तो लगा उनमे भी
अभी वाकी था
वही पुराना वाला
गुरुर ।

सफ़र

उनका नज़र मिलाना
और शरमाना
जारी रहा
पुरे सफ़र
फिर न कोई हमें
ठहरा दे
इसबार भी
कसूरवार
पुरे सफ़र
सालता रहा
हमें ये डर ।

नाराजगी 

न कुछ हम कहे
न कुछ वो कहे
वर्षों तक
न जाने
किस बात पर
हम रहे
एक दुसरे से
नाराज

मैयत 

मैयत पर
वो आये मेरी
मै  समझा
चलो अब तो
उनको याद आयी मेरी
कुछ देर यूँ ही टहलते रहे
फिर बड़ी अदा से
मुस्कराकर बोले वो
हम तो यू ही  किये थे
एक मजाक
तुम सच में
चल दिए।


Thursday, October 4, 2012

हिस्सा

लाख कोशिशों के बाद भी
नहीं बचा पाए थे डाक्टर 
स्वास्थ्य मंत्री जी को ,
पोस्ट मार्टम की रिपोर्ट ने   
सभी को चौकाया था 
मंत्री जी को दी गयी दवा ने 
दवा ने नहीं 
बल्कि जहर का काम किया था ,
मृत्यु की वजह निकली 
नकली दवाइयां ,
स्वास्थ्य विभाग सदमे में है 
मंत्री जी का सचिव उहापोह की स्थिति में है 
की दवा कंपनी से मिला 
इस बार का कमीशन 
खुद ही रख ले या 
फिर मंत्री जी की पत्नी को 
मंत्री जी का हिस्सा 
पहुंचा दिया जाय ....

Sunday, September 9, 2012

कफ़न


मेरे हाथों से 
कफ़न का कपड़ा 
वह छीनकर भागा
पता चला 
उसकी बूढ़ी माँ
कई दिनों से
कंपकपाती ठण्ड में
बिन चादर के  
रात भर 
सो नहीं प़ा रही थी  ।।