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Saturday, October 13, 2012

बस कुछ यूँ ही (कुछ क्षणिकायें )

गुरुर 

एक मुद्दत के बाद
हम मिले थे
कल एक मोडपर
फिर भी
न पूछे गए
एक दूसरे के
हालचाल
कुछ हम थे व्यस्त
अपने पुराने जख्म
सहलाने में
तो लगा उनमे भी
अभी वाकी था
वही पुराना वाला
गुरुर ।

सफ़र

उनका नज़र मिलाना
और शरमाना
जारी रहा
पुरे सफ़र
फिर न कोई हमें
ठहरा दे
इसबार भी
कसूरवार
पुरे सफ़र
सालता रहा
हमें ये डर ।

नाराजगी 

न कुछ हम कहे
न कुछ वो कहे
वर्षों तक
न जाने
किस बात पर
हम रहे
एक दुसरे से
नाराज

मैयत 

मैयत पर
वो आये मेरी
मै  समझा
चलो अब तो
उनको याद आयी मेरी
कुछ देर यूँ ही टहलते रहे
फिर बड़ी अदा से
मुस्कराकर बोले वो
हम तो यू ही  किये थे
एक मजाक
तुम सच में
चल दिए।


12 comments:

  1. बेहतरीन सम्प्रेषणीय क्षणिकायें ।

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  2. उपेन बाबू.. बहुत ही अनोखे अन्दाज़ में कही गयी बातें हैं ये.. सुनी सुनाई होते हुए भी नयी-नवेली सी लगती है...

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  3. न कुछ हम कहे
    न कुछ वो कहे
    वर्षों तक
    न जाने
    किस बात पर
    हम रहे
    एक दुसरे से
    नाराज.

    सभी क्षणिकाएँ बेहतरीन हैं. उम्दा प्रस्तुति.

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  4. क्षणिकाएं बड़ी सुन्दर हैं.

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  5. उनका मजाक हुआ और यहाँ जान से गये,
    जहे नसीब, मजाक किसी काम तो आया।

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  6. जिंदगी के आस-पास बिखरी अनुभूतियों को समेटती हुई बेहतरीन क्षणिकाएं।

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  7. बहुत ही सादा लहजे मे कही गयी क्षणिकाएं.. फिर भी बहुत सुन्दर .
    शुभकामनाये
    मंजुला

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  8. वाह किसी कि जान गई उनकी अदा ठहरी ..
    बढ़िया क्षणिकाएं.

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  9. सभी रचनाये शानदार

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