© कापीराइट

© कापीराइट
© कापीराइट _ सर्वाधिकार सुरक्षित, परन्तु संदर्भ हेतु छोटे छोटे लिंक का प्रयोग किया जा सकता है. इसके अतिरिक्त लेख या कोई अन्य रचना लेने से पहले कृपया जरुर संपर्क करें . E-mail- upen1100@yahoo.com
आपको ये ब्लाग कितना % पसंद है ?
80-100
60-80
40-60

मेरे बारे में

मेरे बारे में
परिचय के लिए कृपया फोटो पर क्लिक करें.

Saturday, July 16, 2016

जिंदगी


आज खुला छोड़ दिया है
हमने दरवाजे
अपनी जिंदगी के
जो रुकना चाहता है रुके
स्वागत है
वरना बेहतर है
चले जाना दूर
रोज रोज की किच किच से
ताकि कल से कोई
शिकायत न रहे
थक गया हू जिंदगी
अब तू भी ले फुरसत
और मुझे भी जीने दे
फुरसत के कुछ पल।

Monday, July 11, 2016

याद


उन्होंने कहा
कि भूल जाओ मुझे
इसके अलावा
अब कोई भी
रास्ता नही बचा है
मैंने कहा
मेरे पास
अब भी बचा है
एक रास्ता
तुम जाओ
मगर छोड़ जाओ
अपनी यादे।।

Thursday, July 7, 2016

छिपा रखा था
बड़ी मुश्किल से
अपने दिल का
इक राज उनसे
आज न जाने कैसे
फड़फड़ाये
मेरी किताब के पन्ने
और उनकी तस्वीर
निकल कर
गिर पड़ी
उनके ही सामने।

Sunday, May 31, 2015

जिंदगी

जिन्दगी  अक्सर एक अधूरे ख्वाब सी लगी
कहीं ये धूप तो कहीं ये छाँव  सी लगी

जब भी समझना चाहता लगी अन्जानी सी
कभी अपनी तो कभी तिलस्मी राज सी लगी

पल - पल बदलते रहे हैं रिस्ते यहाँ पर
कभी दुपहरी तो कभी मुरझाई शाम सी लगी

हर लम्हा कुछ ऐसे गुजरता रहा है कि
कभी स्वाद तो कभी बेस्वाद सी लगी

जख्म सहलाने वाले तो बहुत मिले यहाँ
जख्म सूखे मगर हमेशा ताजी घाव सी लगी

मुश्किल वक्त में भी अपने ना साथ मिले
" उपेन" ये कभी उजड़ी तो कभी आबाद सी लगी।।

Thursday, February 26, 2015

गाँव

चलो
अब लौट चले
वापस  अपने गाँव
जहाँ दिन की दुपहरी होगी
और नीम की छाँव

मक्के की तुम रोटी लाना
और सरसो का साग
ठंडी ठंडी पुरवईया में
मैं छेंडूगा
बिरहे का राग

जहाँ बचपन की होगी
मीठी यादें
दादा दादी के किस्से
खेल-खेल में
बनते और बिगड़ते
गुड्डा-गुड्डी के रिश्ते

जहाँ शहर की मारकाट से
दूर कहीं होंगी
अपने गाँवो  की गलियाँ
पनघट पर बैठ करेंगे
जीभर अठखेलियाँ

जहाँ छत भी अपनी होगी
सारा आसमाँ  अपना
अपने आँगन में
होगी चांदनी रातें
तुम सपनों में आ जाना
हम करेंगे मीठी बातें

अब ये शहर बेगाना लगता है
बेगाने से भाव
चलो
अब लौट चलें
वापस अपने गाँव

Tuesday, January 20, 2015

उम्मीद

दिन के
सारे दर्द
वो पी गया
इस उम्मीद में कि
रात का चाँद
हाेगा शायद
बहुत खूबसूरत
और रात के दर्द
इस उम्मीद में कि
अगले दिन होगी
ईक नई सुबह
ये उम्मीद है तो
ये जिन्दगी है
और जिन्दगी से
खूबसूरत
शायद कुछ भी नहीं ....

Thursday, January 1, 2015

नया साल

कैसा होगा 
नया  साल 
नफ़रत भरा
या प्यार 
रंग भरा 
या  बदरंग 
उम्मीदें  होगी पूरी 
या फिर टूटेंगी 
सच में कुछ बदलेगा 
या हर बार  की तरह 
बदल जाएगी 
इस बार भी 
दीवाल पर टंगी 
पंचांग की तस्वीर 
जो भी हो 
बस पिछले साल 
जो टूटे थे सबके 
उम्मीदों के पंख 
वो निकल आये फिर से
और इस बार न टूटे …  



आप सबको नए साल की हार्दिक शुभकामनायें 

Friday, December 26, 2014

माँ

         1
जब जब मै  गिरता रहा
माँ मझे अकेला
हर बार छोड़ती रही
मै खुद कोशिश करता
उठकर सम्हलने की
और जब भी उठकर खड़ा होता
माँ मुझे चूम लेती
सच आज भी जब जिंदगी
गिरा देती है
वक्त की सीढ़ियों से
मुड़कर देखा हूँ माँ की तस्वीर
और पुनः खड़ा हो जाता हूँ
 एक नए जोश से
और चूम लेता हूँ
माँ की तस्वीर
उठती  है मन में एक कसक
क्यों मै  बड़ा  बन गया
माँ काश मै  फिर से
वो बच्चा बन पाता ।।

     2..
तुम्हारा यूँ  चले जाना
निश्चय ही छोड़ देता है
निराशा  के अँधेरे में
मगर ,
अक्सर लगता है कि
तुम एक ज्योति बन
उन्हें चीर देती हो
ताकि  मै  आगे बढ़ सकू

3...

तुम्हारे जलाये दिये
आज भी जल रहे है
और अँधेरा उन्हें
छू भी  नहीं पा रहा
पता है क्यों …
तुम्हारे सपने मरे नहीं
मैं  उन  सपनों  के संग
आज भी सोता
और जागता  हूँ ।





Friday, March 15, 2013

कुछ क्षणिकायें


१. 

हथियारों के दलाल  
खा गए सब हथियार 
सुना है कि 
फौजी लड़ते है 
लाठी और गुलेल से।।

२. 

कुछ गरीब और आदिवासी 
रोजी रोटी के लिए 
फ़ौज में भर्ती हुए थे 
सुना है कि 
उनकी शहादत पर 
उनके झोपड़े को आलिशान महल 
बना देने की तयारी है।। 


३. 

ना कोई हंगामा हुआ 
ना  किसी ने पत्थर फेंके 
ना कर्फ्यू लगाने की जरुरत पड़ी 
और ना  ही किसी ने मोमबत्तियाँ जलायी 
सुना है कि 
अभी अभी कुछ फौजियों की 
अंतिम यात्रा यहाँ से गुजरी है।। 

४. 

आज भारत बंद नहीं है 
सिर्फ कुछ जवान ही तो मरे है 
सुना है कि 
धर्मनिरपेक्ष और मानवतावादी 
कुछ दिनों की छुट्टियों पर 
आराम फरमाने निकल पड़े है 
थक गए थे बेचारे
वैसे भी ये तो उन फौजियों का फर्ज था 
किसी मानवाधिकार का उलंघन नहीं।। 

१३ मार्च को श्रीनगर में शहीद हुए इन जवानों को सलाम और अश्रुपूरित विदाई 


(Photo courtesy: Indian army fans)

Monday, December 24, 2012

कुछ क्षणिकायें

याद

हम तो थे परिंदा
हमारी हर उड़ान के साथ
अपने लोग भी हमें
अपने दिलों से
उड़ाते गये
आलम अब ये है की
हम याद भी करें तो 
उनको याद नहीं आते है।। 

जख्म

हमें आदत थी
उनके हर चीज को
सम्हालकर रखने की
उनके दिए हर दर्द को भी
हम दिल में
सम्हालकर रखते गए
और जख्म  खाते रहें।।


इल्जाम 

उनके हर इल्जाम 
हम अपने सर लेते गये
इस उम्मीद में की 
यह होगा
आखिरी इल्जाम ।।

रेत

जबसे रेत पर मैंने
तुम्हारा नाम लिखा है
तुमने छोड़ दिया है 
लहर बनकर 
किनारे तक आना ।।

बगिया के फूल

मेरी बगिया में गिरे 
कोमल फूल 
आज बड़े उदास है
कि वो आये 
और बिन मुस्कराए 
लौट गए 
कहीं उनके 
कोमल पैरों में 
छाले तो नहीं 
पड़ गये होंगे ।।