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Wednesday, September 7, 2016

दिल


सोंचता हूँ कभी
जो दिल के होते
दो हाथ अगर
पहले पकड़ता
वह मेरा ही गला
या जड़ देता
दो घूँसे
सम्हाल कर
रख न सका मैं
उसे एक पल भी
ख्वाब और खौफ के बीच
निष्चय और अनिष्चय के बीच
बस रह गया वह हमेशा
एक खौफजदा परिंदे सा।

2 comments:

  1. दिल बच्चा है, दिल पागल है... दिल के सारे खेल हैं बंधू!!

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  2. दिल ऐसा ही होता है पर हमारी हिम्मत ही जवाब दे जाती है ..

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" न पूछो कि मेरी मंजिल है कहाँ, अभी तो सफ़र का इरादा किया है
ना हारूँगा मै ये हौंसला उम्रभर,किसी से नहीं खुद से ये वादा किया है"
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आप का इस ब्लॉग में स्वागत है . आपके सुझावों और विचारों का मेरी इस छोटी सी दुनिया में तहे दिल से स्वागत है...