Sunday, January 8, 2012

जिंदगी

जिन्दगी- सात

कमबख्त
जिन्दगी होने  लगी है
और भी मुश्किल से बसर
जबसे ख्यालों में
वो आजकल 
आने लगे है अक्सर ।।

जिन्दगी- आठ  

दोस्त क्या मिला है
किसको यहाँ
ये तो मुकद्दर
की बात है
वरना जिन्दगी यहाँ है
सिर्फ दो पलों की
एक छोटी सी मुलाकात ।।

जिन्दगी- नौ 

बात जिन्दगी की
वो किये थे
खुद ही शुरू
मगर
जब हम सुनाने लगे
अपनी जिंदगी के हाल
 वो रो दिए थे ।।

जिन्दगी- दस 

जिन्दगी पुरी
गुजर गयी
उस एक जख्म को
सिर्फ सहलाने में
जो दे गए थे वो
पल भर के
मन बहलाने में ।।

                        जिंदगी- एक से छः

.

18 comments:

  1. ज़िंदगी के कितने रूप दिखाए आपने उपेन बाबू!! मगर हर रूप में निराली लगी ये ज़िंदगी!!

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  2. वाह ..हर क्षणिका लाजवाब .

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  3. बढ़िया, जिन्दगी नौ बहुत सुन्दर !

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  4. ज़िंदगी इन सभी क्षणिकाओं में खुलकर सामने आयी है!! बहुत सुन्दर!

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  5. 10 जिंदगी के अलग अलग रंग ....बहुत खूब

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  6. जिंदगी के गजब के रंग बिखेरे हैं शब्दों मे।


    सादर

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  7. कल 10/01/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  8. जिंदगी के कुछ खट्टे मीठे पलों को आपने खूबसूरती से शब्दों में कैद कर लिया है।

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  9. बढ़िया..बहुत बढ़िया...

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  10. सुंदर प्रस्तुति....

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  11. बहुत ही सटीक भाव..बहुत सुन्दर प्रस्तुति
    शुक्रिया ..इतना उम्दा लिखने के लिए !!

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  12. वाह जी बढ़िया कविताएं.

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  13. मन को बहला कर ही सही, जीवन का आनंद उठाना चाहिए।

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  14. वाह सुंदर प्रस्तुति....

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" न पूछो कि मेरी मंजिल है कहाँ, अभी तो सफ़र का इरादा किया है
ना हारूँगा मै ये हौंसला उम्रभर,किसी से नहीं खुद से ये वादा किया है"
. (अज्ञात)
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