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Tuesday, September 14, 2010

हिन्दी - दिवस

हिंदी- दिवस के
शुभ अवसर पर
हिंदी को प्रोत्साहित करने के लिए
हुआ था एक सभा का आयोजन
अतिथि महोदय पधारे थे
मंच पर धीरे धीरे
मुस्कराते हुए
फूल मालाओं के बीच
भाषण की शुरुआत की थी
उन्होंने अपने की छोटे से
परिचय के साथ -
" डिअर ब्रदर्स एंड सिस्टर्स
प्यारे से मेरे फ्रैन्डस मुझे
जे. के. साहब के नामे से पुकारते है
मैं तो कोई ज्यादा
पढ़ - लिख नहीं पाया था
पर, मेरा बेटा कैम्ब्रिज युनिवर्सिटी से
पी. एच. डी. कर रहा है.....।"

15 comments:

  1. hahahahahaahaha
    aajkal hindi ke rehnuma kuch aie hi hain

    sundar vyang

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  2. उपेन्द्र जी ,

    अब तो यह दिवस भी एक त्यौहार सा हो गया है ...यहाँ भी साल भर में इसी महीने हिंदी कार्यक्रमों का आयोजन होता है .....

    क्या कहेंगे .....?

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  3. waah bahut khub upendra ji achha vynagy prahar hai ..........aksar hota hai log apni baton me
    hindi bolte waqt english ko shamil kar na jane kyon garv ki anubhuti karte hain ..........

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  4. सुन्दर कटाक्ष

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  5. wah... bahut hi sunder kataksh...
    kam shabd gahari baat.
    hakikat bayan karati sunder si prastuti

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  6. उपेन्द्र जी कोई कुछ भी कर ले पर हिदीं तो हमारे दिलों में बसी है।

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  7. उपेंद्र जी,
    आप सेटींग्स में एक बार देख लें..आपकी पोस्ट मेरे ब्लॉग फीड पर अपडेट नहीं हो रही...इसलिए मुझे पता नहीं चल रहा...

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  8. सुन्दर व्यंगात्मक प्रस्तुति,
    यहाँ भी पधारें :-
    अकेला कलम...

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  9. haan .........bilkul sahi.....Hindi Diwas k uplaksh par bhi hindi bolne me pareshan ....yahi banti ja rhi hai dheere dheere aaj hmare naye Bharat ki pehchan...acchha kataksh hai....

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  10. bahut achha vyang kiya aapne yahi hal hai sab jagah , badhai

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  11. सलिल साहब मेरे ब्लाग पर आकर कीमती सुधाव देने के लिये घन्यबाद । आपका बहुत आभार । सेटींग्स अपडेट हो गयी है।

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  12. प्रिय बंधुवर उपेन्द्र जी
    नमस्कार !

    कविता में बहुत सटीक व्यंग्य के साथ यथास्थिति का चित्रण करने में सफल हुए हैं ।

    बधाई एवम् शुभकामनाएं !

    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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" न पूछो कि मेरी मंजिल है कहाँ, अभी तो सफ़र का इरादा किया है
ना हारूँगा मै ये हौंसला उम्रभर,किसी से नहीं खुद से ये वादा किया है"
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