© कापीराइट

© कापीराइट
© कापीराइट _ सर्वाधिकार सुरक्षित, परन्तु संदर्भ हेतु छोटे छोटे लिंक का प्रयोग किया जा सकता है. इसके अतिरिक्त लेख या कोई अन्य रचना लेने से पहले कृपया जरुर संपर्क करें . E-mail- upen1100@yahoo.com
आपको ये ब्लाग कितना % पसंद है ?
80-100
60-80
40-60

मेरे बारे में

मेरे बारे में
परिचय के लिए कृपया फोटो पर क्लिक करें.

Friday, March 15, 2013

कुछ क्षणिकायें


१. 

हथियारों के दलाल  
खा गए सब हथियार 
सुना है कि 
फौजी लड़ते है 
लाठी और गुलेल से।।

२. 

कुछ गरीब और आदिवासी 
रोजी रोटी के लिए 
फ़ौज में भर्ती हुए थे 
सुना है कि 
उनकी शहादत पर 
उनके झोपड़े को आलिशान महल 
बना देने की तयारी है।। 


३. 

ना कोई हंगामा हुआ 
ना  किसी ने पत्थर फेंके 
ना कर्फ्यू लगाने की जरुरत पड़ी 
और ना  ही किसी ने मोमबत्तियाँ जलायी 
सुना है कि 
अभी अभी कुछ फौजियों की 
अंतिम यात्रा यहाँ से गुजरी है।। 

४. 

आज भारत बंद नहीं है 
सिर्फ कुछ जवान ही तो मरे है 
सुना है कि 
धर्मनिरपेक्ष और मानवतावादी 
कुछ दिनों की छुट्टियों पर 
आराम फरमाने निकल पड़े है 
थक गए थे बेचारे
वैसे भी ये तो उन फौजियों का फर्ज था 
किसी मानवाधिकार का उलंघन नहीं।। 

१३ मार्च को श्रीनगर में शहीद हुए इन जवानों को सलाम और अश्रुपूरित विदाई 


(Photo courtesy: Indian army fans)

Monday, December 24, 2012

कुछ क्षणिकायें

याद

हम तो थे परिंदा
हमारी हर उड़ान के साथ
अपने लोग भी हमें
अपने दिलों से
उड़ाते गये
आलम अब ये है की
हम याद भी करें तो 
उनको याद नहीं आते है।। 

जख्म

हमें आदत थी
उनके हर चीज को
सम्हालकर रखने की
उनके दिए हर दर्द को भी
हम दिल में
सम्हालकर रखते गए
और जख्म  खाते रहें।।


इल्जाम 

उनके हर इल्जाम 
हम अपने सर लेते गये
इस उम्मीद में की 
यह होगा
आखिरी इल्जाम ।।

रेत

जबसे रेत पर मैंने
तुम्हारा नाम लिखा है
तुमने छोड़ दिया है 
लहर बनकर 
किनारे तक आना ।।

बगिया के फूल

मेरी बगिया में गिरे 
कोमल फूल 
आज बड़े उदास है
कि वो आये 
और बिन मुस्कराए 
लौट गए 
कहीं उनके 
कोमल पैरों में 
छाले तो नहीं 
पड़ गये होंगे ।।




Monday, December 17, 2012

लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया के लिए चंद पंक्तियाँ

आज बेचैन हूँ
पूरा दिन ढूंढ़ता रहा
किताबों का वो पन्ना 
जहाँ लिखा हुआ
कभी पढ़ा था
शहीदों की चिताओं पर
लगेंगे हर वर्ष मेले
मगर नहीं मिला वो पन्ना
कहीं धूल खा रहीं होगी
हमारी याददास्त भी
उन पन्नों की ही तरह
हम भूलते गए उन्हें
उनके परिजन होते रहे
दर-बदर अकेले

कहाँ हमें करना था इन्हें
दिलो-जान से प्यार
हम करते रहें इन्हें
पहचानने से भी इंकार
दिल पर लगे घाव
मां  के बहते आँसू पोंछ
हमें भाई-बहना की
उम्मीद को जगाना था
मगर हमने अदा की कीमत
कुछ को पेट्रोल पम्प
कुछ को गैस एजेंसी
और प्लाट बाँट  
हमने समझा
अपने कर्तव्यों की इतिश्री
वो भी आधे कागजों पर
और आधी हकीकत 

साल में एक बार
ढोल- बाजों के साथ
याद  कर लेना
देशभक्ति के गीत गा लेना
नहीं हो जाता इससे
शहीदों का सम्मान
पता नहीं ये सम्मान
जुबां  से दिल तक कभी
उतर पायेगा या नहीं ......




 ( कारगिल युद्ध 1999 में शहीद होने वाले 4 जाट रेजिमेंट के लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया का जन्म हिमांचल प्रदेश के पालनपुर में 29 जून 1976 में हुआ था . कारगिल युद्ध के समय पाकिस्तान  ने इन्हें इनके पांच साथियों, सिपाही अर्जुन राम ( नागौर , राजस्थान), सिपाही भंवर लाल बागडिया ( सीकर, राजस्थान) सिपाही भीखाराम ( बाड़मेर, राजस्थान ),सिपाही मूलाराम ( नागौर, राजस्थान ) और सिपाही नरेश सिंह ( अलीगढ, उत्तर प्रदेश) के साथ सीमा पर गस्त के दौरान घेरकर अपहरण कर लिया और 22 दिन अपनी कस्टडी में टार्चर  करने के बाद इन्हें मारकर  भारतीय सीमा में फेंक दिया। इन सबको बर्बर यातनाये दी गयी और इनके नाख़ून , आँखे निकाल ली गयी थी और सर धड से अलग करके क्षत- विक्षत हालत में भारतीय सीमा में फेंका गया था .
   इस  घटना के बाद लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया के पिता श्री नरेन्द्र कालिया को दिल का दौरा  पड़ा और  कुछ दिनों बाद उनकी नौकरी जाती रही। आजकल वो सरकार  द्वारा  दी गयी एक गैस एजेंसी के सहारे अपना और अपने परिवार का पालन पोषण कर रहे है। अपने बेटे के कातिलों को सजा दिलवाने के लिए हर तरफ से हारकर और सरकारी रवैये से निराश होकर वे हेग के अंतर्राष्ट्रीय न्यायलय में इसे ले जाने की कोशिश में लगे है । पाकिस्तानी सेना ने इन युद्ध बंदियों के साथ जो बर्बरतापूर्ण कार्यवाही की वह हर तरफ  से अंतर्राष्ट्रीय संधि और युद्ध अधिनियम का सरेआम उल्लंघन था।

Friday, November 30, 2012

अतिथि तुम कब जाओगे

सर्दी खांसी और जुखाम 
आजकल है ये मेरे मेहमान 
तीन दिनों से पैर टिकाये 
नहीं ले रहे जाने का नाम ।। 

तीनों आये है पूरी तयारी संग
कोई दिखता नहीं किसी से कम  
दिन रात  है इनका पहरा ऐसा 
बंद हुई खुशिओं की दुकान।।

शैतानी इनकी हरदम रहती जारी 
नहीं मानते ये किसी की बात 
जब डाक्टर आकर इनको धमकाता 
ये बन जाते बिलकुल अन्जान।। 

जब ये फरमाते है थोडा आराम 
हमें भी मिलती है थोड़ी राहत 
वरना इनकी जी-हुजूरी में 
फंसी हुई है अपनी जान।। 

बार- बार पूछता हूँ इनसे 
अतिथि तुम कब जाओगे 
ये मुस्कराकर देते है जबाब 
बहुत दिन बाद मिले हो जजमान

सर्दी खांसी और जुखाम 
आजकल है ये मेरे मेहमान ।।

Sunday, November 25, 2012

हरकीरत हीर जी के काव्य संग्रह " दर्द की महक " और "सरस्वती सुमन" पत्रिका के क्षणिका विशेषांक के लोकार्पण की कुछ झलकियाँ


कल 24 नवम्बर को गुवाहाटी प्रेस क्लब में हरकीरत हीर जी के काव्य संग्रह " दर्द की महक " और उनके ही संपादन में निकली देहरादून से प्रकाशित होने वाली  "सरस्वती सुमन" पत्रिका के क्षणिका विशेषांक  का लोकार्पण हुआ। 


 इस अवसर की कुछ झलकियाँ :-

बाये से- श्री आनंद सुमन सिंह , श्री जी एम श्रीवास्तव जी, श्री किशोर जैन जी, श्रीमती सुधा श्रीवास्तव जी और श्रीमती हरकीरत हीर जी 

सरस्वती सुमन के क्षणिका विशेषांक का विमोचन 

हीर जी द्वारा रचित काव्य संग्रह " दर्द की महक" का विमोचन 



"दर्द की महक" का आवरण पृष्ट 

 "दैनिक पूर्वोदय" में ये खबर 


Tuesday, October 23, 2012

कुछ क्षणिकायें



1.   लोकतंत्र 

लोकतंत्र ने पूछा 
इसबार किसपर 
लगाओगे  मुहर
मतदाता  मुस्कराता है
महँगी होगी जिसकी शराब
लोकतंत्र बेचारा 
फिर हो जाता है उदास ।।

2.  असमंजस

भगवान बड़े असमंजस में है
कि किसकी सुने
सौ तोले का सोने का हार
भक्त ने आज ही चढ़ाया है
कि धंधा खूब फले- फूले
भक्त के कसाईखाने में
कटने को तैयार गाय की गुहार थी       
हे भगवन मुझे बचा ले ...।।

3 .  दहेज़-हत्या 

नेताजी का तर्क था
जब सारा देश
नाच सकता है
हमारी उंगुलियों पर 
तब हमारी बहू भला 
क्यों नहीं नाची..?

4.   पीढ़ी-दर-पीढ़ी 

तुम्हारे बाप ने 
जिस जिन्दगी को 
तलाश  किया था 
दूध की कटोरियों में 
तुमने उसी जिन्दगी को पाया 
पेप्सी और कोका-कोला से 
भरी बोतलों में
आज तुम्हाता बेटा ढूंढ़ रहा है
उसी जिन्दगी को 
शराब और बीयर की बोतलों में ।।

5.  जख्म

जिन्दगी पुरी
गुजर गयी
उस एक जख्म को
सिर्फ सहलाने में
जो दे गए थे वो
पल भर के 
मन बहलाने को ।।

6. चुनाव के बाद

अब पाँच  साल तक नंगे  रह लेना
फिर आकर ये साड़ी बाँटेगे
छलकेगें दारू के जाम
तब तक प्यासे रह लेना 
नोटों की अगली बारिश तक
बस कंकड़ - पत्थर गिनते रहना । 

(सरस्वती सुमन के क्षणिका विशेषांक में ये मेरी भी कुछ क्षणिकायें) 



Saturday, October 13, 2012

बस कुछ यूँ ही (कुछ क्षणिकायें )

गुरुर 

एक मुद्दत के बाद
हम मिले थे
कल एक मोडपर
फिर भी
न पूछे गए
एक दूसरे के
हालचाल
कुछ हम थे व्यस्त
अपने पुराने जख्म
सहलाने में
तो लगा उनमे भी
अभी वाकी था
वही पुराना वाला
गुरुर ।

सफ़र

उनका नज़र मिलाना
और शरमाना
जारी रहा
पुरे सफ़र
फिर न कोई हमें
ठहरा दे
इसबार भी
कसूरवार
पुरे सफ़र
सालता रहा
हमें ये डर ।

नाराजगी 

न कुछ हम कहे
न कुछ वो कहे
वर्षों तक
न जाने
किस बात पर
हम रहे
एक दुसरे से
नाराज

मैयत 

मैयत पर
वो आये मेरी
मै  समझा
चलो अब तो
उनको याद आयी मेरी
कुछ देर यूँ ही टहलते रहे
फिर बड़ी अदा से
मुस्कराकर बोले वो
हम तो यू ही  किये थे
एक मजाक
तुम सच में
चल दिए।


Thursday, October 4, 2012

हिस्सा

लाख कोशिशों के बाद भी
नहीं बचा पाए थे डाक्टर 
स्वास्थ्य मंत्री जी को ,
पोस्ट मार्टम की रिपोर्ट ने   
सभी को चौकाया था 
मंत्री जी को दी गयी दवा ने 
दवा ने नहीं 
बल्कि जहर का काम किया था ,
मृत्यु की वजह निकली 
नकली दवाइयां ,
स्वास्थ्य विभाग सदमे में है 
मंत्री जी का सचिव उहापोह की स्थिति में है 
की दवा कंपनी से मिला 
इस बार का कमीशन 
खुद ही रख ले या 
फिर मंत्री जी की पत्नी को 
मंत्री जी का हिस्सा 
पहुंचा दिया जाय ....

Sunday, September 9, 2012

कफ़न


मेरे हाथों से 
कफ़न का कपड़ा 
वह छीनकर भागा
पता चला 
उसकी बूढ़ी माँ
कई दिनों से
कंपकपाती ठण्ड में
बिन चादर के  
रात भर 
सो नहीं प़ा रही थी  ।।


Sunday, July 15, 2012

सोशल नेटवर्किंग साइट्स की आभासी दुनिया

           आज समाज का कोई भी वर्ग हो, इंटरनेट एक  महत्वपूर्ण जरुरत बन गया है। यह हम सबके लिए आनलाईन लाइब्रेरी और ज्ञान का भंडार है , मनोरंजन के  ढेरो श्रोत उपलब्ध करता है तो वहीँ जीवन की तमाम बेहद जरुरी चीजों जैसे बिजनेस , बैंकिंग, आनलाइन रिजरवेशन इत्यादि को और भी आसान  बना देता है। मगर इस जरुरत के हिसाब से अगर आप इंटरनेट पर समय व्यतीत  आप करते है तो ठीक है लेकिन अगर सिर्फ टाइम पास करने के लिए फेसबुक , आर्कुट , ब्लॉग और ट्विटर जैसी सोशल साईटों  के आदी  बन चुके है तो यह चिंता का विषय है।

            इन दिनों लोग सोशल नेटवर्किंग साईटों खासकर फेसबुक के एडिक्शन का शिकार हो रहे है। शुरू में इस बात का पता नहीं लगता मगर धीरे धीरे आप इसके आगोश में फँसते जाते है और यह आपके समय पर हावी होता जाता है.  इन  सोशल नेटवर्किंग साईटों में  एक दुसरे से बिना किसी परेशानी के सिर्फ एक क्लिक पर आसानी से जुड़ा  जा सकता है , सबको  समझा जा सकता है और सबसे अपने विचारों को शेयर किया जा सकता है. यह एक आभासी मित्रों की दुनिया होती है जहाँ हम  वास्तविक रूप में अपने दोस्तों से बिना मिले भी मिल लेते है।

          फेसबुक इन सोशल नेटवर्किंग साईटों में आज युवा वर्ग की  पहचान बन चुका है। जैसे यह उनके लिए एक स्टेटस सिम्बल बन गया है  ।  मिलने पर हाय हेलो की जगह पहले फेसबुक आईडी ही पूछा जाने लगा है। ऐसा लगता है की आज जो फेसबुक पर नहीं है उसके लिए अपने दोस्तों के बीच एक हीन  भावना बन  गयी है। आज फेसबुक हमारे समाज में कई तरह के परेशानियों का सबब भी ले कर आ रहा है।

          फेसबुक का सबसे पहला प्रभाव ये पड़ रहा की हमारे आभासी फ्रेंड लिस्ट में जहाँ दोस्तों की संख्या  दिन दुनी रात  चौगनी बढती जा रही है वहीँ वास्तविक दोस्तों की संख्या तेजी से घटती जा रही है। जो शाम  हम अपने दोस्तों के बीच मस्ती से कभी बिताया करते थे वह समय अब फेसबुक दोस्तों के लिए चला जा रहा है। दोस्त से वास्तविक मुलाकात हुए भले ही महीने बीत चुके हो मगर फेसबुक पर वह रोज मिल जाता है।हमारी तरह वो भी अपने आनलाईन दोस्तों की संख्या में इजाफा करने में लगा रहता है। अगर कहा जाय  की यह दोस्तों का दुश्मन है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।

         जहाँ तक मेरा मानना  है इस इन सोशल नेटवर्किंग साईटों की आदत किसी और नशे जैसे  शराब , सिगरेट , गुटके जैसी ही होती है जो न मिले तो बेचैन कर देती है। आज अगर एक सप्ताह नेट ख़राब हो जाय  या किसी अन्य कारण  से से नेट से दूर रहना पड़ जाये तो काफी अकेलापन लगने लगता है . जैसे लगता है की दुनिया से संपर्क हुए वर्षों बीत गए हो। यह धीरे धीरे हमें  अपने नशे का शिकार बना लेता है और इससे दूर होना हमें खलने लगता है। चिडचिडापन आने लगता है और लोगों में फील गुड फील बैद बन जाता है।

          सोशल नेटवर्किंग साईट्स एक खुली किताब की तरह होती है, जहाँ  लोग अपनी पर्शनल बातें जो  किसी से शेयर नहीं कर पाते या कहने में संकोच  करते है , उसे यहाँ  बिना किसी परेशानी के शेयर करते है  ।   अपने पद , प्रतिष्ठा और स्टेटस सिम्बल का लोग खुलकर  बखान करते है अतः इससे जो फेसबुक यूजर्स उस स्टेटस को नहीं पा सकते उनमें हीन  भावना आने लगी है। किसी फ्रेंड  के फ्रेंड लिस्ट में दोस्तों की अधिक संख्या भी  फेसबुक यूजर्स में हीन भावना भरती है की कैसे  मेरे दोस्तों की संख्या कम है और क्यों नहीं बढ़ रही  है। इसके लिए लोग ज्यादा से ज्यादा नेट  पर देने  लगते है  ।   लोगों में होड़ लग जाती है कितने ज्यादा मैटर और फोटो नेट से सर्च करके स्टेटस अपडेट किया जाय ।
       
           इसके  अलावा इन साईट्स पर स्टेटस अपडेट , कमेन्ट और  लाईक को सफलता की कुंजी मान जाता है। जिसे जितने कमेन्ट और लाईक मिले वह उतना ही बड़ा बन जाता है। इससे जो इस साईट्स पर नए है और जिन्हें पर्याप्त कमेन्ट और लाईक नहीं मिल पाते उनमें भी हीन  भावना घर कर लेती है। वैसे इन कमेन्ट और  लाईक   की हकीकत ये होती है की आप जितना देंगे उतना ही आपको बदले में मिलने की सम्भावना ज्यादा रहती है . मगर इसके लिए समय चाहिए जो हर किसी के पास बराबर नहीं।

            इनकी वजह से लोग बेहद जरुरी काम  भी  जल्दी जल्दी निपटा लेते है। लोग घर- परिवार के लिए पहले जितना टाईम  नहीं दे पाते ।   इस चक्कर में कुछ जरुरी काम छूट  भी जाते है। जो समय लोग  नेट पर फालतू में नष्ट कर दे रहे है उन्हें अगर बच्चों के साथ बिताये और घर परिवार के बारे में सोंचे तो ज्यादा बेहतर होगा।
 
            यह लोंगों की  रचनात्मकता को भी ख़त्म करती जा रही है। ज्यादा कमेन्ट और लाईक  के चक्कर में लोग बिना सोंचे समझे दूसरों की प्रोफाईल पर जाकर कमेन्ट और लाईक की झड़ी लगा देते है। क्योंकि अगर ऐसा नहीं करेंगें तो उनके प्रोफाईल के स्टेटस  पर सूखा ही सूखा पड़ा रहेगा। ऐसे में लोग अपनी रचनात्मक सोंच को छोड़ चापलूसी वाले अंदाज में आ जाते है और जो जितना ज्यादा भ्रमर कर लेता है उनके यहाँ उतने ही भँवरे दस्तक दे जाते है।ऐसे में ये बिना सोंचे समझे लाईक  और कमेन्ट का खेल और ज्यादा से ज्यादा दोस्त बनाने की उत्सुकता  अपनी रचनात्मकता  के हिसाब से अच्छा संकेत नहीं है।

            इन सबके अतिरिक्त इंटरनेट पर  ज्यादा समय बिताना खुद की सेहत के साथ भी खिलवाड़ है। ऐसे लोंगों में नींद पूरी न होने की शिकायत रहती है। रात  में नींद पूरी न होने से पूरे  दिन आफिस और काम  की जगह लोग थके थके से पाए जाते है ।  कमर, गर्दन और हथेलियों का दर्द आम बात बनती जा रही है. आँखों पर असमय ही चश्में आने लगे है।

           अगर आपको भी लगता है की इन  सोशल नेटवर्किंग साईटों  पर समय व्यतीत करते हुए आपको भी इन बातों  का आभास हुआ है  तो अब सम्हालने की बारी आ गयी है। सबसे पहली बात की इनके लिए एक समय निर्धारित करें की बस उसी निश्चित  समय में ही फेस्बुकाई , ब्लागिरी  ट्विटरई  और आरकुटाई  करना है। बाकि समय आपके जरुरी काम - धन्धों   और घर परिवार के लिए रहे। इन सबसे जरुरी की आपके अनुपस्थिति में आपके बच्चे नेट पर क्या कर रहे है इसका लेखा जोखा आपको चुपके चुपके  रखना चाहिए। जरुरत के लिए तो लोग अपने बच्चों को पढाई का हवाला देकर इंटरनेट दिला देते है , अच्छी बात है , मगर फेसबुक और इन साईटों  दे दूर रखना भी पैरेन्ट  की ही जिम्मेदारी है। इसके अलावा कभी कभी बच्चे उत्सुकतावश या अनजाने में गलत साईट  खोल बैठते है और बाद में उसके आदी हो जाते है।

            वास्तविक दोस्तों के बीच  समय बिताना , बातें शेयर करना और एक दुसरे की समस्यायों   को जानना बेहद जरुरी है। वर्चुअल और हकीकत की दुनिया का अंतर समझाना ही सही रहेगा । दूसरों के स्टेटस पर लाईक और कमेन्ट देख अपना  माथा न खुजलाये।   जरुरी कामों को पहले निपटाये । अपने हर मिनट मिनट का हिसाब अपडेट  न करें और अपनी कुछ खाश  नीजी बातों को पब्लिकली शेयर न करें तो अच्छा रहेगा ।   कभी कभी आपकी इन नीजी बातों  और फोटो को गलत प्रयोग भी लोग कर लेते है। सोशल नेटवर्किंग साइट्स  की इस आभासी दुनिया के आदी  न बने और जरुरत के हिसाब से इंटरनेट को प्राथमिकता  दें और कम से कम सप्ताह में एक दिन ऐसा चुने जो आपका , आपके परिवार का और आपके वास्तविक दुनिया का हो और इन्टरनेट को एक दिन आराम दे।